'ऑपरेशन सिंदूर': भारत की सबसे बड़ी रणनीतिक चूक ? और 2026 के वैश्विक समीकरण



भारतीय रणनीतिक चूक: क्या 'ऑपरेशन सिंदूर' को रोकना एक ऐतिहासिक गलती थी?



इतिहास गवाह है कि युद्ध के मैदान में जीती गई बाज़ी अक्सर राजनीतिक मेज पर हार दी जाती है। भारतीय सैन्य इतिहास में भी ऐसे कई मोड़ आए हैं जहाँ हमारी सेना ने दुश्मन को घुटनों पर ला दिया, लेकिन राजनीतिक दबाव या कूटनीतिक (Diplomatic) फैसलों ने उस विजय को पूर्ण निष्कर्ष तक पहुँचने से रोक दिया। आज हम आपके सामने एक ऐसे ही ज्वलंत विषय का विश्लेषण करेंगे—'ऑपरेशन सिंदूर' और उसे बीच में रोकने का फैसला।

पहलगाम से ऑपरेशन सिंदूर तक का सफर

पहलगाम की आतंकवादी घटना ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया था। उस समय की भारत सरकार ने एक मजबूत नेतृत्व दिखाते हुए पाकिस्तान को कड़ा सबक सिखाने का निर्णय लिया। भारतीय सेना ने अपनी क्षमता का लोहा मनवाते हुए महज 3 दिनों के भीतर पाकिस्तान को बैकफुट पर ला दिया। पाकिस्तान की 'Attacking' और 'Defense' दोनों क्षमताओं को पूरी तरह से न्यूट्रलाइज (Neutralize) कर दिया गया था।

स्थिति ऐसी थी कि पाकिस्तान अपने अस्तित्व को बचाने के लिए युद्धविराम (Ceasefire) की गुहार लगाने लगा। इसमें अमेरिका (USA) का भी बड़ा दबाव शामिल था। लेकिन सवाल यह है कि क्या वह समय पाकिस्तान को माफ करने का था?

POK वापस लेने का स्वर्णिम अवसर: क्या हमने मौका गंवा दिया?

जब भारतीय सेना का मनोबल उच्चतम स्तर पर था और देश की अर्थव्यवस्था बेहतर प्रदर्शन कर रही थी, तब 'ऑपरेशन सिंदूर' को 'पॉज' (Pause) करना एक बड़ी रणनीतिक भूल (Strategic Blunder) साबित हुई।

उस समय कई परिस्थितियाँ भारत के पक्ष में थीं:

  1. सेना और जनता का अटूट समर्थन: पूरा देश सेना के साथ खड़ा था।

  2. वैश्विक समीकरण: उस समय इज़रायल-USA और ईरान के बीच युद्ध की स्थिति वैसी नहीं थी जैसी आज है।

  3. ऊर्जा सुरक्षा: उस समय ऊर्जा सुरक्षा को लेकर उतनी चिंता नहीं थी जितनी आज के संकटमय समय में है।

अगर उस समय भारत सरकार ने POK (पाक अधिकृत कश्मीर) वापस ले लिया होता, तो आज पाकिस्तान की हैसियत नहीं होती कि वह भारत के खिलाफ किसी सैन्य कार्यवाही के बारे में सोचे भी।

जियोपॉलिटिकल शतरंज: USA, ईरान और चीन का खेल

आज मार्च-अप्रैल 2026 में परिस्थितियाँ और भी पेचीदा हो गई हैं। वैश्विक राजनीति के समीकरण कुछ इस प्रकार हैं:

  • USA का स्वार्थ: अमेरिका वर्तमान में ईरान के साथ युद्ध में फँसा हुआ है। वह चाहता है कि भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव बढ़े ताकि दुनिया का ध्यान ईरान से हटकर इस क्षेत्र पर आ जाए।

  • ऊर्जा सुरक्षा का संकट: भारत के लिए 'हॉर्मुज जलडमरूमध्य' (Strait of Hormuz) ऊर्जा आपूर्ति का सबसे सुगम मार्ग है। ईरान-USA युद्ध के कारण यहाँ भारत पर दबाव बढ़ेगा और कूटनीतिक समझौता करना भारत की मजबूरी बन सकता है।

  • चीन-पाकिस्तान नेक्सस: कोरोना के बाद से चीन की अर्थव्यवस्था धीमी हो रही है और कई विदेशी कंपनियाँ भारत का रुख कर रही हैं। चीन के लिए सबसे आसान रणनीति यही है कि भारत को पाकिस्तान के साथ युद्ध में उलझा दिया जाए ताकि भारत आर्थिक रूप से पिछड़ जाए। चीन सैटेलाइट और इंटेलिजेंस के जरिए पाकिस्तान की मदद कर रहा है।

सऊदी अरब और 'इस्लामिक उम्मा' का पेंच

एक और महत्वपूर्ण पहलू सऊदी अरब-पाकिस्तान रक्षा समझौता है। सऊदी अरब चाहता है कि पाकिस्तान की सेना का उपयोग ईरान और हूती विद्रोहियों के खिलाफ किया जाए। लेकिन पाकिस्तान के लिए यह आत्मघाती हो सकता है क्योंकि एक मुस्लिम राष्ट्र होने के नाते 'मुस्लिम से मुस्लिम' की लड़ाई उसकी आंतरिक राजनीति को अस्थिर कर सकती है। इसलिए, अपनी जनता का ध्यान भटकाने के लिए पाकिस्तान 'भारत से नफरत' और युद्ध का माहौल बनाने को ही सबसे सुरक्षित रास्ता मानता है।

2026: 'प्रो-एक्टिव' कदमों की जरूरत

हाल ही में मार्च-अप्रैल 2026 में भारत में हो रही उच्च-स्तरीय CCS (कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी) की बैठकें, रक्षा मंत्री के भाषण संकेत दे रहे हैं कि भारत अब पुरानी गलतियों को नहीं दोहराएगा। कयास लगाए जा रहे हैं कि भारतीय सेना फिर से किसी बड़ी सैन्य कार्यवाही की तैयारी में है।

अब समय आ गया है कि भारत 'गोल-मोल' राजनीतिक बातों से बाहर निकले। अभी ऑपरेशन सिंदूर बंद नहीं हुआ है / ये ceasefire नहीं है / अभी युद्ध विराम नहीं हुआ है , ये तो pause हुआ है आदि जैसे गोल मोल बातों से आम जनता को तो बहला  सकते हैं लेकिन ये दुश्मन को पुनः तैयारी करने का समय देता है और कुछ भी हासिल नहीं होता।  अगर पाकिस्तान की तरफ से किसी भी बड़े षड्यंत्र का इंटेलिजेंस मिलता है, तो भारतीय सेना को 'Pro-Active' कदम उठाकर सीमा विवाद को हमेशा के लिए समाप्त कर देना चाहिए।

निष्कर्ष:

राजनीतिक भूलों की कीमत देश को दशकों तक चुकानी पड़ती है। आज आम जनता को अपनी सरकार और सेना के साथ मज़बूती से खड़े होने की ज़रूरत है ताकि 'ऑपरेशन सिंदूर' जैसी स्थिति फिर न बने और हम अपने लक्ष्यों को पूर्ण रूप से प्राप्त कर सकें।

जय हिंद!







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